Sunday, December 25, 2016

गाँव

गाँव आज भी वैसे ही हैं, यह अलग बात है कि आपका और हमारा गाँव बदल गया है, लेकिन जहां संसाधनों की कमी है, स्थिति वहां आज भी पहले जैसी ही है। मौसम के बदलते मिजाज के हिसाब से लोग अपने को तैयार कर लेते हैं, और उसकी तैयारी महीनों से शुरू हो जाती है। पहाडों के इन गांवों में बर्फ जल्दी ही पड़ेगी और फिर कुछ महीने के लिए यह दुनिया से कट जाएंगे, सड़कें बर्फ से लद जाएंगी और आवागमन ठप्प पड़ जाएगा। खाने पीने की सब्जियों के लिए तार पे लटके टोकरे ही काम आएंगे वह भी तब जब सब्जियों बाज़ारों मे आएंगी।

गोशाल नाम का यह गाँव होटल के पास है, सड़क से नीचे, बर्फ गिरने पर लोग उपर भी नहीं आ सकते और नदियाँ आने जाने का रास्ता बंद कर देती हैं, अगल बगल के जंगलों से लकड़ियाँ अभी से ही जमा किया जाने लगा है, ठंड के दिनों के लिए, मवेशियों को भी खिला पिला के स्वस्थ रखा जाता है अधिक परेशानी होने पर वही भोजन भी बनते हैं महीनों तक क्यूंकि कुछ और नहीं होता। हमारे ड्राइवर ने कहा सर वही बकरा सुबह भी और शाम भी, मसाले भी ना के बराबर, फिर पैसे कहाँ इतने है जो मसाले रखे जाएं महीनों के लिए। लकड़ियों की भी बड़ी दिक्कत है, सूखे पेड़ भी काटने के लिए सरकारी हुक्म की जरूरत पड़ती है, कुछ घर पहाड़ के ऊपर हैं वह तो कुछ हफ्ते सूखे मीट खाकर भी चलाते हैं और अगर समस्या बढ़ती है तो नीचे के गांवों मे शरण लेते हैं। जो लोग उपर फँस जाते हैं उन्हें जान भी गंवानी पड़ती है।
जो टूरिस्ट देर से आते हैं उन्हे बरफ देखने की बड़ी इच्छा होती है यह पूछने पर ड्राइवर कहता है, हाँ साहब ख़ुद तो मरते हैं और हमें भी मारते हैं लेकिन रोटी किसको नहीं सुहाती, कभी कभी विवश कर देती है। यात्री ही यहां के भगवान हैं लेकिन यह सोच बार बार आती है क्या सबको यह सब दिखता है?
पहाड़ के ऊपर सूरज डूबने लगा है, हम होटल के पास पहुंच चुके थे.... सेब के बागीचे इस समय नंगे थे बरफ के बाद वह भी हरे हो जाएंगे और ये गाँव भी।



































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